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बाबा ने कहा अभी प्रसव में समय है, अस्पताल पहुंची महिला ने दिया स्वस्थ्य बालक को जन्म

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बाबा ने कहा अभी प्रसव में समय है, अस्पताल पहुंची महिला ने दिया स्वस्थ्य बालक को जन्म

विश्वास से बदलाव तक सेंधवा जनपद के ग्राम पंजरिया की प्रेरणादायक कहानी

बड़वानी (नरेंद्र तिवारी) आदिवासी अंचल में गर्भवती महिलाओं को बाबा के परामर्श से अस्पताल नहीं लेकर जाने और प्रसव का समय होने के बाद भी बाबा के फरमान को मानने पर अड़े परिजनों और गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने की मशक्क़त करती स्वास्थ्य टीम और समझाइस के असर के सकारात्मक परिणाम के कहानी कुछ इस प्रकार है।
कार्यक्रम दस्तक अभियान, अंतरा फाउंडेशन स्वास्थ्य के क्षेत्र में परिवर्तन तब संभव होता है जब समय पर कार्यवाही, सटीक जानकारी और संवेदनशील संवाद साथ मिलकर कार्य करें। ग्राम पाँजरिया की यह घटना इसका एक जीवंत उदाहरण है।
स्थिति की शुरुआत दस्तक अभियान के अंतर्गत ग्राम पाँजरिया में सामुदायिक बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मीनाक्षी, अंतरा फाउंडेशन से सुश्री रिया एवं श्री दिलीप साथ ही अन्य सदस्य उपस्थित थे। बैठक का उद्देश्य अधिक से अधिक लाभार्थियों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाना और समुदाय को अभियान के महत्व से अवगत कराना था।
बैठक के दौरान जानकारी मिली कि एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है। डॉ. मीनाक्षी और सफ़दर एवं शुभम तुरंत महिला के घर पहुँची। वहाँ देखा गया कि परिवार ने एक ‘‘ बाबा ‘‘ से परामर्श किया था, जिन्होंने कहा कि प्रसव का समय अभी नहीं आया है। इस विश्वास के चलते परिवार ने अस्पताल ले जाने से साफ़ इनकार कर दिया।
उच्च जोखिम की गंभीरता
जाँच के दौरान यह पाया गया कि महिला उच्च जोखिम गर्भवती है, जिसकी प्रसव तिथि निकल चुकी थी। यह उसका पाँचवाँ गर्भ था, जबकि पहले तीन प्रसव घर पर ही हुए थे। साथ ही महिला एनीमिया (खून की कमी) से भी पीड़ित थी। यह स्थिति बेहद नाज़ुक थी, लेकिन पारंपरिक सोच और अंधविश्वास आड़े आ रहे थे।

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समझाइश और सामूहिक प्रयास
इस संकटपूर्ण परिस्थिति में डॉ. मीनाक्षी, अंतरा फाउंडेशन की टीम, आशा कार्यकर्ता और वर्लाे कमांडो ने मिलकर एक घंटे तक लगातार परिवार को समझाया। सामाजिक मिथकों और डर को दूर करते हुए, धैर्यपूर्वक संवाद और सम्मानजनक तरीक़े से परिवार को अस्पताल जाने के लिए तैयार किया गया।
सफल हस्तक्षेप का परिणाम
तत्परता दिखाते हुए तत्काल एम्बुलेंस मँगवाई गई और महिला को चाचरिया अस्पताल रेफ़र किया गया। वहाँ उसने एक स्वस्थ बालक को जन्म दिया, जिसका वजन 2.800 किलोग्राम था। वर्तमान में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की गाइड लाइनों के अनुसार सेंधवा ब्लाक के कम्युनिटी मोबिलाइज़र की निगरानी में आशा कार्यकर्ता द्वारा गृह भेंट की जा रही है।
निष्कर्ष
यह घटना एक उदाहरण है कि सही समय पर हस्तक्षेप, टीम वर्क और संवेदनशील संवाद के माध्यम से हम सामाजिक मान्यताओं और अंधविश्वास को भी मात दे सकते हैं। जब समर्पित प्रयास और विश्वास साथ चलते हैं, तब बदलाव संभव होता है।’ यह है विश्वास से बदलाव तक की यात्रा।

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