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चारो और से खुला सेंधवा मंडी परिषर उपज की सुरक्षा में ट्रेक्टर पर सोने की मजबूरी, लाखो का कृषक भवन अनुपयोगी

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सेंधवा (नरेंद्र तिवारी) शहर की कृषि उपज मंडी इन दिनों लापरवाही के गंभीर दौर से गुजर रही है। मंडी चारो तरफ से खुली है इसका कोई परिषर नही है, किसान को खुद अपनी उपज की सुरक्षा हेतु तैनात रहना होता है, खासकर रात में आने वाले कृषक इस समस्या से जूझते है। मंडी प्रशासन के पास इन किसानो की समस्या को सुनने के लिए एक मंडी सचिव भी नही है, जो है वह स्थाई नही है। सेंधवा की प्रभारी मंडी सचिव जिला मुख्यालय बड़वानी के साथ सेंधवा की भी प्रभारी है, सचिव सुमन बडोले को बड़वानी मंडी में रहना अधिक जरुरी जान पड़ता है। वह सेंधवा सप्ताह में दो से तीन दिवस रहती है, हाँ जरूरत पड़ने पर भागी भागी सेंधवा आ पहुँचती है। कहने का आशय यह है की सेंधवा में स्थाई सचिव का अभाव है। समस्या सिर्फ स्थाई सचिव की नही है, समस्या किसानो के कड़कड़ाती ठंड में किराए के गद्दे लेकर सोने की है, सोमवार रात 11 बजे इस प्रतिनिधी ने मंडी परिसर में जाकर जानना चाहा तो पाया की करीब 15 से 20 मक्का से भरे वाहन जिनमे अधिकांश टेक्टर है। इन ट्रेक्टरों पर किसान अपने घर से लेकर आए कंबल ओढे हुए है सभी ट्रेक्टरों पर गद्दे एक से थै। ग्राम उपला से आए किसान ने अपना नाम गोलू बताया उसने कहा की यह गद्दे किराए से लाए है। खाना घर से बनाकर लाए है। सुबह जल्दी नीलामी हो जाए इसलिए रात में ही मंडी आकर अपने मक्का से भरे वाहन खड़े कर दिए। ग्राम हिंदली का कृषक मंशाराम भी अपना वाहन लेकर आया था। मंशाराम रात में किले के बाहर की होटल से नाश्ता कर वही से पानी भरकर भी लेकर आया। कृषक जिस समय अपने ट्रेक्टर पर मक्का की सुरक्षा के लिए किराए के गद्दे लाकर सोए हुए है। मंडी का परिषर चारो और से खुला है। किसानो की उपज की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था होती तब किसान चैन की नींद कृषक विश्राम गृह में आराम कर सकता है। किंतु स्थानीय मंडी में लाखों रूपये की लागत से बने कृषक भवन की उपयोगिता को समझना कठिन हो जाता है। रात 11 बजे मंडी परिषर में किसान को किराए के गद्दे लेकर सोने की मजबूरी मंडी की सारी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाती प्रतीत हुई। यह जब और आश्चर्यजनक लगा की कृषक भवन के नाम से 35 से 40 लाख रू खर्च कर एक अत्याधुनिक कृषक भवन का निर्माण मंडी समिति ने किसानो के विश्राम के लिए कराया था, किन्तु मंडी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यह भवन किसानों के ठहरने के कभी काम नही आया। इसका उपयोग और संचालन के बारे में मंडी प्रशासन मौन है? किंतु लाखो की लागत का भवन होने के पश्चात मक्का के ट्रेक्टर पर कड़कड़ाती ठंड में किसान सोने को मजबूर है। कहा तो यह भी जा रहा है की किसानो को कम ख़र्च में भोजन भी मंडी को उपलब्ध कराया जाता है? पहले यह व्यवस्था थी किंतु अब नही दिखती है। शुद्ध पानी की व्यवस्था भी किसानो के लिए नही है।। मंडी सचिव की स्थाई पोस्टिंग भी सेंधवा मंडी में नही है न ही निवास है। भारसाधक अधिकारी तक पहुंचना किसानों के लिए संभव नही है। सेंधवा कृषि उपज मंडी में लापरवाही चरम पर है, किसानो की व्यवस्था का ध्यान मंडी प्रशासन को नही है। लाखों की लागत का कृषक भवन किसानो के काम नही आ रहा भोजन और शुद्ध पेयजल का अभाव साफ दिखाई दे रहा है। इस पर किसानो की सरकार का जुमला कितना हास्यास्पद और मजाक लगता है। यह अव्यवस्था किसानो में सरकार के प्रति गुस्सा पैदा करती है।

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