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सेंधवा माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना में वन अधिकार पट्टाधारी किसानों को माँ नर्मदा के सिंचाई जल से वंचित रखना दुर्भाग्यपूर्ण – विधायक श्री मोंटू सोलंकी

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सेंधवा (न्यूज करंट) विधानसभा के विधायक मोंटू सोलंकी ने सेंधवा माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना में वन भूमि पर कृषि करने वाले वन अधिकार पट्टाधारी आदिवासी किसानों को सिंचाई का लाभ नहीं मिलने का मुद्दा मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रमुखता से उठाया।
विधायक मोंटू सोलंकी ने विधानसभा में प्रश्न के माध्यम से सरकार से पूछा कि क्या सेंधवा माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना में राजस्व भूमि के किसानों को सिंचाई जल उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि वन भूमि पर परंपरागत खेती कर रहे आदिवासी किसानों को इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है? साथ ही उन्होंने प्रभावित किसानों की संख्या, पेसा अधिनियम के प्रावधानों, राजस्व एवं वन भूमि के किसानों के बीच असमानता तथा परियोजना में संशोधन कर वन अधिकार पट्टाधारी किसानों को भी सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने संबंधी सरकार की मंशा के बारे में जानकारी मांगी।
सरकार ने अपने उत्तर में स्पष्ट किया कि वन विभाग के प्रचलित प्रावधानों के अनुसार वन भूमि को परियोजना के कमाण्ड क्षेत्र में सम्मिलित नहीं किया गया है तथा वन भूमि पर खेती कर रहे किसानों को सिंचाई सुविधा देने संबंधी वर्तमान में विभाग के विचाराधीन कोई प्रस्ताव नहीं है। अर्थात सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि वन अधिकार पट्टाधारी किसानों को सिंचाई परियोजना का लाभ देने के लिए उसकी कोई योजना या पहल वर्तमान में नहीं है।
सरकार के इस उत्तर पर विधायक श्री मोंटू सोलंकी ने कहा कि यह सेंधवा विधानसभा के हजारों वन अधिकार पट्टाधारी आदिवासी किसानों के साथ अन्याय एवं भेदभाव है। उन्होंने कहा कि वन अधिकार पट्टाधारी किसान भी मध्यप्रदेश के नागरिक हैं। वे भी मतदान करते हैं, सरकार चुनते हैं और प्रदेश के विकास में समान भागीदारी निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि जब इन्हीं किसानों को सरकार द्वारा वन अधिकार पट्टा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, कूप (कुआँ) निर्माण, सहकारी समितियों से खाद-बीज, कृषि ऋण, फसल बीमा तथा अन्य शासकीय योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है, तो फिर केवल माँ नर्मदा के सिंचाई जल से उन्हें वंचित रखने का कोई औचित्य नहीं है। यदि सरकार उन्हें किसान मानकर सभी योजनाओं का लाभ दे सकती है, तो सिंचाई परियोजना से बाहर रखने का निर्णय पूरी तरह भेदभावपूर्ण है।
विधायक मोंटू सोलंकी ने कहा कि वर्षों की प्रतीक्षा के बाद आज हमारे क्षेत्र में माँ नर्मदा का सिंचाई जल पहुँच रहा है, लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वन अधिकार पट्टाधारी आदिवासी किसानों को इससे वंचित रखा जा रहा है। यह तर्क दिया जाता है कि यह भूमि वन विभाग के अधीन आती है, जबकि इसी वन अधिकार क्षेत्र में सरकार सड़क बनाती है, कुटीर स्वीकृत करती है, स्कूल बनाती है तथा अनेक विकास कार्य कराती है। जब सभी योजनाएँ वन अधिकार क्षेत्र में लागू हो सकती हैं, तो सिंचाई का पानी क्यों नहीं दिया जा सकता? आदिवासी समाज खेती पर निर्भर है और खेती के लिए पानी उसका अधिकार है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष कहते हैं कि यह परियोजना वे लेकर आए हैं। मेरा सीधा सवाल है कि यदि यह परियोजना आपके प्रयासों से आई है तो केवल आधी सेंधवा विधानसभा में ही क्यों लाई गई? यदि परियोजना लानी थी तो पूरी सेंधवा विधानसभा में लाते। बाकी क्षेत्रों के आदिवासी किसानों के साथ भेदभाव क्यों किया जा रहा है?

विधायक श्री मोंटू सोलंकी ने कहा कि सरकार आदिवासियों को आगे बढ़ाना ही नहीं चाहती। एक तरफ किसानों को सिंचाई का पानी नहीं दिया जा रहा है, दूसरी तरफ शिक्षा व्यवस्था को भी पूरी तरह कमजोर कर दिया गया है। सेंधवा विधानसभा के 160 स्कूल शिक्षकविहीन हैं, 327 शिक्षकों के पद रिक्त हैं तथा 168 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं। पिछले वर्ष 92 शिक्षकों का स्थानांतरण किया गया तथा इस वर्ष भी 68 शिक्षकों का स्थानांतरण कर दिया गया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष ने क्या कभी इन गंभीर मुद्दों पर संज्ञान नहीं लिया है क्या आदिवासी बच्चों की शिक्षा की चिंता किसी को नहीं है

उन्होंने कहा कि सरकार बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं देना चाहती, किसानों को खेती के लिए पानी नहीं देना चाहती और बेरोजगार युवाओं को रोजगार नहीं देना चाहती। यही कारण है कि सेंधवा विधानसभा से आधे से अधिक लोग रोजगार की तलाश में महाराष्ट्र और गुजरात पलायन करने को मजबूर हैं। हमारे क्षेत्र की बड़ी कपास आधारित औद्योगिक इकाइयाँ भी बंद हो गईं, लेकिन सरकार ने कभी इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया।

विधायक श्री मोंटू सोलंकी ने कहा कि सेंधवा विधानसभा में वन अधिकार के 6,500 से अधिक प्रकरण लंबित हैं। मैं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष को भी इस तथ्य से अवगत कराना चाहता हूँ और उनसे मांग करता हूँ कि केवल 150–200 पट्टे बाँटने से कुछ नहीं होगा। सभी पात्र लंबित प्रकरणों का एक साथ निराकरण कर वन अधिकार पट्टे वितरित किए जाएँ तथा वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित किया जाए, ताकि आदिवासी किसानों और युवाओं को शासन की सभी योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके।

उन्होंने कहा कि अब यह बहाना नहीं चल सकता कि यह वन ग्राम है और यह राजस्व ग्राम है। आज से 14–15 वर्ष पहले 24 घंटे बिजली मुख्य बस्ती तक पहुँचा दी गई, लेकिन गाँवों के भीतर बसे अनेक फलियों में आज भी लोग 24 घंटे बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। मेरी राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष से मांग है कि वे इन समस्याओं को गंभीरता से समझें और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी पहल करें।

विधायक श्री मोंटू सोलंकी ने कहा कि सरकार की यह नीति आदिवासी किसानों के हितों के विपरीत है। एक ओर सरकार किसानों की आय बढ़ाने और सिंचाई का रकबा बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर वन अधिकार पट्टाधारी किसानों को परियोजना के कमाण्ड क्षेत्र से बाहर रखकर उन्हें माँ नर्मदा के पानी से वंचित कर रही है। यह दोहरी नीति स्वीकार्य नहीं है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि सेंधवा माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना में तत्काल आवश्यक संशोधन कर वन अधिकार पट्टाधारी किसानों को भी शामिल किया जाए तथा पात्र किसानों के खेतों तक माँ नर्मदा का सिंचाई जल पहुँचाने के लिए शीघ्र निर्णय लिया जाए।

अंत में विधायक श्री मोंटू सोलंकी ने कहा, “हम कांग्रेस की पूरी टीम और जयस की टीम के साथ आदिवासी समाज, किसानों और युवाओं के अधिकारों की लड़ाई लगातार लड़ते रहेंगे। यदि वन अधिकार पट्टाधारी किसानों को माँ नर्मदा सिंचाई परियोजना का पानी, वन ग्रामों में 24 घंटे बिजली, स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, अस्पतालों में डॉक्टर तथा युवाओं को रोजगार उपलब्ध नहीं कराया गया तो एक बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। मैं सेंधवा विधानसभा के प्रत्येक वन अधिकार पट्टाधारी किसान के अधिकारों की लड़ाई विधानसभा से लेकर सड़क तक मजबूती से लड़ता रहूँगा और अंतिम किसान तक माँ नर्मदा का पानी पहुँचाने के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

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